शीर्षक = वो लौट आया
चाय की दुकान पर बैठे अनुज क़ो चाय देने के बाद चाय की टपरी के मालिक ने कहा " बेटा! इस बार तुम्हे बहुत दिन हो गए विदेश से लोटे हुए, क्या बात हे इस बार दोबारा जाने क मन नही हे क्या? "
अनुज ने चहरे पर एक मुस्कान सजायी और बोला " मन तो मेरा पहले भी नही होता था, अपने घर अपने मोहल्ले अपने दोस्त रिश्तेदार सब क़ो छोड़ कर पराये देश जाने का लेकिन क्या करें मजबूरी चीज ही ऐसी हे, कि न चाहते हुए भी आपको वो काम करना पड़ता हे "
"बात तो ठीक हे तुम्हारी, भला किसे अच्छा लगता हे अपना घर और उस जैसा ऐशो आराम छोड़ कर किसी पराये मुल्क या पराये शहर जाना जहाँ आपका कोई भी न हो " चाय वाले काका ने कहा
"सही कहा काका, जो मजा अपने घर अपने मोहल्ले और अपनों के साथ आता हे, वो वहाँ अकेले नही आता है, इसलिए अब मैंने फैसला किया है कि अब मैं परदेस नही जाऊंगा, मेरा वहाँ से लोट कर आने में ही भलाई है, वो इसलिए क्यूंकि अब मेरे परिवार क़ो मेरी ज़रूरत है
इससे पहले उनकी नज़र में मुझसे ज्यादा पैसे कि एहमियत होने लगे, मेरी जगह मेरा कमाया पैसा लेने लगे इससे पहले ही मैं उन्हें वो सब करने से रोक लूँगा
इन चंद महीनों में जो कुछ बदलाव मैंने अपने बच्चों में देखा उसे देख कर यही जाना कि अब मेरा परदेस से लोट आना ही ठीक है, पहले मुझे लगता था कि पैसे से मैं अपने परिवार क़ो खुश रख सकूँगा, समय समय पर उनकी ज़रूरत पूरी करता रहूंगा तो अपना पिता, पति, भाई, और बेटा होने का फर्ज़ बखूबी निभाता रहूंगा। लेकिन दस साल परदेस में काटने के बाद मुझे एहसास होने लगा है कि अगर ऐसे ही मैं सिर्फ पैसे से ही उनकी ज़रूरत पूरी करता रहा तो एक दिन मुजसे ज्यादा उन्हें पैसे की कमी खलने लगेगी, इससे पहले की वो घड़ी मुझ पर आये उससे पहले ही मैं वहाँ से लोट आया शायद यही वजह है एक महीने भी ठीक से न रुक पाने वाला ये अनुज आज तीन महीने से अपने परिवार के साथ है
इन तीन महीनों में जो कुछ मैंने महसूस किया वो शायद मैं पिछले दस सालों में भी महसूस नही कर पाया था,क्यूंकि फ़ोन पर तो हम अक्सर झूठ ही बोल देते है और घर वाले भी हमेशा बात क़ो जब तक छिपाने का प्रयास करते है जब तक की वो बात दूसरों से हमारे कानो में न पहुंच जाए, क्यूंकि वो यही सोचते है की वहाँ उसका इस बात पर क्या प्रभाव पड़ेगा कही वो कुछ गलत कदम न उठा ले
इन सब बातों के चलते ही अब मैंने यहां अपने देश, अपने घर वापस आने का फैसला कर लिया था,ख़्वाहिशे तो कभी न पूरी हुयी है और न ही कभी हो पायेगी बस ज़रूरत पूरी होती रहे इतनी ईश्वर से प्रार्थना है, यही सोच कर अब यही रुक कर अपने परिवार के साथ उनके सुख दुख में सेहभागि बनने का सोच लिया है " अनुज ने कहा
चाय वाले काका ने उसके सर पर हाथ फेरा और बोले " बहुत ही अच्छा फैसला लिया तुमने, सही समय अपने परिवार के साथ शामिल होने का उनके सुख दुख में साथ खड़े होने का, वैसे भी तुम उनके हर सुख दुख के साथी थे लेकिन दूर थे कुछ बाते तुम तक पहुंच पाती थी तो कुछ नही लेकिन अब जब तुम उनके साथ रहोगे उनके पास रहोगे तब तुम्हे सब कुछ अच्छे से महसूस हो पायेगा, तुम ने अच्छा फैसला लिया लोट आने का "
अनुज ने अपनी चाय ख़त्म की और एक प्यारी सी मुस्कान सजा कर अपने घर की और चला गया
समाप्त….
प्रतियोगिता हेतु
Alka jain
26-Feb-2023 02:30 PM
Nice
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पृथ्वी सिंह बेनीवाल
25-Feb-2023 08:50 AM
Nice
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डॉ. रामबली मिश्र
24-Feb-2023 11:20 PM
बहुत खूब
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